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राजस्थान में लंबे समय से लंबित नगरीय निकाय और पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव को लेकर सियासत एक बार फिर तेज हो गई है। स्वायत्त शासन मंत्री झाबर सिंह खर्रा ने साफ किया है कि राज्य सरकार अपने स्तर पर चुनाव से जुड़ी सभी प्रशासनिक प्रक्रियाएं पूरी कर चुकी है।

अब चुनाव कार्यक्रम घोषित करना राज्य निर्वाचन आयोग और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आयोग की संवैधानिक प्रक्रिया पर निर्भर है।

उन्होंने विपक्ष पर दोहरी नीति अपनाने का आरोप लगाते हुए कहा कि एक तरफ कांग्रेस चुनाव में देरी का मुद्दा उठा रही है, वहीं दूसरी ओर ओबीसी राजनीतिक आरक्षण भी बनाए रखना चाहती है।

दरअसल, राजस्थान हाईकोर्ट ने 31 जुलाई तक निकाय और पंचायत चुनाव कराने के निर्देश दिए हैं। इसके बावजूद चुनाव कार्यक्रम घोषित नहीं होने पर कांग्रेस नेता संयम लोढ़ा ने अवमानना याचिका दायर की है, जिसमें राज्य सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग के अधिकारियों को पक्षकार बनाया गया है।इस पूरे घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए यूडीएच मंत्री ने कहा कि सरकार ने परिसीमन और पुनर्सीमांकन का कार्य मार्च 2026 में ही पूरा कर दिया था। सरकार के स्तर पर अब कोई लंबित प्रक्रिया नहीं बची है।

चुनाव की चाबी अब निर्वाचन आयोग और ओबीसी आयोग के पास

खर्रा ने कहा कि संविधान के अनुसार निकाय और पंचायत चुनाव कराने का अधिकार राज्य निर्वाचन आयोग के पास है। वहीं ओबीसी को राजनीतिक आरक्षण देने के लिए सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित ट्रिपल टेस्ट की प्रक्रिया पूरी करना राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग की जिम्मेदारी है। ऐसे में चुनाव की अगली प्रक्रिया दोनों आयोगों के बीच समन्वय पर निर्भर करेगी।

ट्रिपल टेस्ट के लिए वैज्ञानिक आंकड़ों पर जोर

यूडीएच मंत्री ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि स्थानीय निकायों में ओबीसी को राजनीतिक आरक्षण देने से पहले ट्रिपल टेस्ट की प्रक्रिया पूरी करना अनिवार्य है।

इसके तहत वास्तविक जनसंख्या, स्थानीय निकायों में पिछड़ा वर्ग की स्थिति और उनके प्रतिनिधित्व का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता है। राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग इसी आधार पर अपनी रिपोर्ट तैयार कर रहा है।

उन्होंने कहा कि यह केवल औपचारिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि संवैधानिक आवश्यकता है। इसलिए सरकार चाहती है कि रिपोर्ट पूरी तरह तथ्यात्मक और कानूनी रूप से मजबूत हो, ताकि भविष्य में चुनाव प्रक्रिया किसी न्यायिक विवाद में न फंसे।

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