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1933 के आसपास की बात है। महाराष्ट्र और गुजरात की सीमा के पास स्थित माता रानी के एक मंदिर में एक महिला पहुंची। मान्यता थी कि यहां सच्चे मन से मांगी गई कोई भी मुराद कभी खाली नहीं जाती। महिला की बस एक ही कामना थी-एक बेटे की। उसने माता रानी के चरणों में सिर झुकाकर मन्नत मांगी, ‘अगर मुझे पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, तो मैं उसे दस साल तक उधार मांगकर लाए गए कपड़े ही पहनाऊंगी।’समय बीता और माता रानी ने उसकी पुकार सुन ली। उसके घर एक बेटे का जन्म हुआ। यही बच्चा आगे चलकर भारतीय सिनेमा का एक ऐसा सितारा बना, जिसकी अदाकारी आज भी मिसाल मानी जाती है। उसने फिल्म शोले में ठाकुर बलदेव सिंह के किरदार को अमर कर दिया।

संजीव कुमार के पिता जेठालाल शिवलाल जरीवाला गुजरात के सूरत के एक संपन्न जरी व्यापारी थे। उनके परिवार के पास आलीशान हवेली, घोड़ा-गाड़ी और उस दौर की तमाम शान-ओ-शौकत थी, लेकिन इतनी संपत्ति होने के बावजूद उनकी निजी जिंदगी में कई दुख आए।

संजीव कुमार के भतीजे उदय जरीवाला की किताब संजीव कुमार: द एक्टर वी ऑल लव्ड के अनुसार, जेठालाल की पहली शादी से दो बेटियां लक्ष्मी और जसु हुईं। कुछ समय बाद उनकी पहली पत्नी का बीमारी के कारण निधन हो गया। इसके बाद उन्होंने दूसरी शादी की। दूसरी पत्नी ने एक बेटी भगवती को जन्म दिया, लेकिन प्रसव के दौरान उनका भी निधन हो गया।

इसके बाद जेठालाल की तीसरी शादी शांता बेन से हुई। शांता बेन की सबसे बड़ी इच्छा थी कि परिवार को एक बेटा मिले। इसके लिए वह महाराष्ट्र-गुजरात सीमा पर स्थित चारोटी के माता मंदिर में जाकर मन्नत मांगती थीं। उन्होंने प्रण लिया कि यदि बेटा हुआ, तो उसे 10 साल तक दान में मिले कपड़े उसे पहनाएंगी और उसका मुंडन भी उसी मंदिर में कराएंगी।

करीब पांच साल बाद उनकी मन्नत पूरी हुई और 9 जुलाई 1938 को हरिहर जरीवाला का जन्म हुआ। यही हरिहर आगे चलकर हिंदी सिनेमा के मशहूर अभिनेता संजीव कुमार के नाम से पहचाने गए।

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