पहले स्वदेशी कोविड वैक्सीन कोवैक्सीन के विकास में अहम भूमिका निभाने वाले हेल्थ रिसर्च विभाग के पूर्व सचिव और आईसीएमआर के पूर्व डीजी पद्मश्री डॉ. बलराम भार्गव का कहना है कि कोविड वैक्सीन के पांच साल बाद साइड इफेक्ट्स होने का कोई प्रमाण नहीं है। भारत अब अगली महामारी की तैयारी, कम लागत वाले इलाज, एआई आधारित डायग्नोस्टिक्स और मेडिकल इनोवेशन पर तेजी से काम कर रहा है। प्रस्तुत हैं उनसे बातचीत के प्रमुख अंश–
ब्रेस्ट और सर्वाइकल कैंसर की जांच को सेंसर और प्रोटॉन पर टच-फ्री तकनीकें विकसित हो रही है, ताकि महिलाएं झिझकें नहीं
क्या यह सच है कि कोवैक्सीन के साइड इफेक्ट अब तक नजर आ रहे हैं? अधिकांश लोगों में जटिलता नहीं आती। हालांकि कोवीशील्ड के कुछ मामलों में क्लॉटिंग का जोखिम बढ़ा था, लेकिन ऐसी जटिलताएं 4 से 6 सप्ताह में ही सामने आती हैं। ऐसी साइंटिफिक स्टडी उपलब्ध नहीं है, जो यह साबित करती हो कि 5 साल बाद भी साइड इफेक्ट्स हो रहे हैं।
देश में मेडिकल रिसर्च अब किस पर फोकस कर रही है? देश भविष्य के किसी भी पेंडेमिक यानी महामारी से निपटने के लिए पहले से तैयारी कर रहा है। आईसीएमआर, बायोटेक और अन्य वैज्ञानिक संस्थानों के साथ मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित किया जा रहा है। नए डायग्नोस्टिक टूल और टेस्ट तैयार किए जा रहे हैं, ताकि जल्द जांच हो और तुरंत इलाज संभव हो सके। हालांकि क्लीनिकल ट्रायल बड़ी चुनौती है। अब आईसीएमआर, बायोटेक विभाग, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग और नेशनल रिसर्च फाउंडेशन के माध्यम से पर्याप्त ग्रांट उपलब्ध हैं। इससे भारत क्लीनिकल ट्रायल्स पर आधारित स्वदेशी डायग्नोस्टिक टूल और इलाज विकसित कर सकेगा।दिल की बीमारी,डायबिटीज और कैंसर के ट्रीटमेंट में क्या बदलाव होगा? पहले कोविड जैसी संक्रामक बीमारियां बड़ी चुनौती थीं, लेकिन अब ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, कैंसर और मोटापा जैसी नॉन-कम्युनिकेबल बीमारियों का खतरा तेजी से बढ़ रहा है। देश के कई वैज्ञानिक संस्थान एंटी-ओबेसिटी, एंटी-डायबिटिक और एंटी-कैंसर दवाओं पर काम कर रहे हैं। भारत की सबसे बड़ी ताकत कम लागत में समाधान विकसित करना है। सीमित संसाधनों में कम खर्च और कम वेस्टेज के साथ काम करना हमारी विशेषता है। आने वाले समय में क्वांटम कंप्यूटिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ड्रग डिस्कवरी में क्रांति लाएंगे।
महिलाएं ब्रेस्ट व सर्वाइकल कैंसर जांच में हिचकिचाती हैं, क्या टच फ्री जांच संभव है? ज्यादातर ग्रामीण और शहरी महिलाएं, शारीरिक संपर्क वाली जांच प्रक्रियाओं के कारण ब्रेस्ट और सर्वाइकल कैंसर की स्क्रीनिंग कराने से झिझकती हैं। इस समस्या को देखते हुए अब सेंसर आधारित, फोटो आधारित और प्रोटॉन आधारित टच-फ्री तकनीकें विकसित की जा रही हैं। एआई का भी उपयोग बढ़ रहा है। जैसे-जैसे एआई की लर्निंग बेहतर होगी, जांच की सटीकता लगभग 100 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। कई भारतीय कंपनियां इस दिशा में काम कर रही हैं।
हिंदुस्तान के साइंस और रिसर्च से जुड़े टैलेंट के ब्रेन ड्रेन को रोकने के लिए क्या प्रयास हो रहे हैं? भारत की सबसे बड़ी जरूरत रिवर्स ब्रेन ड्रेन या ब्रेन गेन है। प्रधानमंत्री कार्यालय और नेशनल रिसर्च फाउंडेशन ने शीर्ष प्रतिभाओं को वापस लाने के लिए कुछ योजनाएं शुरू की हैं, लेकिन इसे राष्ट्रीय अभियान का रूप देना होगा, ताकि भारतीय वैज्ञानिक और शोधकर्ता देश में रहकर योगदान दें। चीन ने 2008 में खुद को नॉलेज ड्रिवन इकोनॉमी बनाने के लिए थाउजेंड टैलेंट्स प्लान शुरू कर विदेशों में कार्यरत अपने टॉप साइंटिस्ट और रिसर्चर्स को आकर्षक पैकेज देकर वापस बुलाया।यूएस के स्टेम यानी साइंस,टेकनोलॉजी, इंजीनियरिंग और मैथ्स के दिग्गजों को भी खास अवसर दिए। इससे चीन ने साइंस और रिसर्च में तेजी से बढ़त बनाई।
साइंटिफिक एप्टीट्यूड बढ़ाने के लिए एजुकेशन सिस्टम में क्या बदलाव होने चाहिए? मेरी वैज्ञानिक यात्रा मेरे स्कूल के बायोलॉजी टीचर और मेंटर जी.आर. साहनी सर की वजह से शुरू हुई। सर ने सवाल पूछना और किसी भी अवधारणा को पूरी तरह समझने तक संतुष्ट न होना सिखाया। पूरी क्लास लेने के बाद वे चॉक की धूल से भर जाते थे, लेकिन उससे बेफिक्र, वो सिर्फ स्टूडेंट्स की आंखों में साइंस के प्रति जिज्ञासा की चमक ढूंढ़ते थे।मुझे लगता है भारत को मजबूत नॉलेज इकोनॉमी बनाने के लिए बुनियादी स्तर से ही शिक्षकों को बेहतर प्रशिक्षण और सम्मानजनक पैकेज देना होगा, खासकर टियर-2 और टियर-3 शहरों में। साथ ही बचपन से भारतीय मूल्यों और संस्कारों को शिक्षा का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। विज्ञान के साथ आर्ट्स,परफॉर्मिंग आर्ट्स, सोशल साइंस और लिटरेचर को भी पाठ्यक्रम में बराबर महत्व मिलना चाहिए, तभी छात्रों की रचनात्मकता और समग्र बुद्धिमत्ता विकसित होगी।स्टूडेंट्स को स्क्रीन से हटकर फिर से किताबों और प्रत्यक्ष संवाद की ओर लौटाना होगा। ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन सहित कई देशों ने 16 वर्ष तक के बच्चों के लिए मोबाइल उपयोग पर प्रतिबंध जैसे कदम उठाए हैं, जबकि स्कैंडिनेवियाई देशों के कई स्कूल फिर से चॉक और ब्लैकबोर्ड आधारित शिक्षण की ओर लौट रहे हैं।
