जैसा कि मैंने ऊपर बताया मुझे प्रिया पसंद तो थी, लेकिन उससे कहने की हिम्मत नहीं हुई। तब मैंने उसके बारे में अपनी दोस्त मतलब सहेली आकांक्षा को बताया। वो चौंक गई और कहने लगी- ‘तू तो खुद लड़की है। ये कैसी बातें कर रही है।मैं आठवीं क्लास में था। नाम था अंकिता यादव। मेरे ही क्लास के दूसरे सेक्शन में प्रिया नाम की एक लड़की थी। बहुत पसंद थी वो मुझे। जब भी वो आस-पास होती मुझे अजीब सा महसूस होता। बस लगता कि उसे देखता रहूं। उससे बातें करूं। अब आप सोच रहे होंगे मेरा नाम लड़कियों जैसा, लेकिन बातें तो लड़कों जैसी हैं। सही सोचा आपने। हां, तब मैं शरीर से तो लड़की था, लेकिन मेरे भीतर एक लड़का था। भीतर का वो लड़का हमेशा घुटता रहता। मैं खुद से पूछता, दुनिया के लिए तो मैं लड़की हूं, ऐसे में जिस लड़की से प्यार करता हूं, उसे ये कैसे बताऊं। किस मुंह बताऊं।
मैंने उससे कहा- भले ही मैं लड़की दिखता हूं, लेकिन मुझे लड़कों की तरह रहना पसंद है। मुझे शर्ट-पैंट पहनकर घूमना पसंद था। लड़कियों वाले कपड़ों में दम घुटता था। लंबे बाल संवारना मेरे लिए मुसीबत थी। हर बार उन्हें काटकर फेंकने का मन करता था। धीरे-धीरे ये बात पूरे स्कूल में फैल गई। सब मजाक उड़ाने लगे। एक दिन मैं वॉशरूम जा रहा था, तभी क्लास के कुछ लड़कों ने घेर लिया। कहने लगे- ‘तू तो हमारी तरह है ना। तू भी लड़का है ना, तभी तुझे भी हमारी तरह लड़कियां पसंद हैं। ब्यॉज टॉयलेट में चल, लड़कियों के टॉयलेट में क्यों जा रही है।’ ये बातें सुनकर मैं इतना घबरा गया कि पेट दर्द का बहाना बनाकर घर चला गया। अगले दिन स्कूल में सब कहने लगे कि अंकिता दिखती भले ही लड़की है, लेकिन है वो लड़का। जब मैं दोबारा टॉयलेट गया तो कुछ सीनियर्स और क्लास की लड़कियों ने घेर लिया। उन्होंने जबरदस्ती मेरी सलवार उतारी और प्राइवेट पार्ट चेक किया। फिर ये कहते हुए वहां से चले गए- अरे तू तो लड़की है। फिर तुझे लड़कियां क्यों पसंद हैं। उस वक्त मेरे मन में क्या चल रहा था ये शायद ही कोई समझ पाएगा। ऐसा लग रहा था कि आत्महत्या करने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा है।
किसी भी ट्रांसजेंडर की पहली लड़ाई परिवार और स्कूल से शुरू होती है। हम लोग दिल्ली के नजफगढ़ में रहते थे। मैं 6 भाई-बहनों में सबसे छोटा था। पापा चाय की दुकान लगाते थे। इसी से घर के 9 लोगों का खर्च चलता था। मेरे पैदा होने के बाद खर्च और बढ़ गया।

ढाई साल का हुआ तो पापा को लकवा मार गया। वो बिस्तर पर आ गए। घर चलाने की जिम्मेदारी मां पर आ गई और वो दुकान पर बैठने लगी।
तब किसी रिश्तेदार ने मां से कह दिया कि तुम्हारी छोटी बेटी मनहूस है। जबसे वो पैदा हुई है पूरा घर मुसीबतों से घिरा है। उसके बाद से भाई-बहनों समेत सभी रिश्तेदारों ने मनहूस कहना शुरू कर दिया। समय बीतता गया और मेरे ही घर में मेरे खिलाफ नफरत बढ़ने लगी। एकबार बड़ी बहन को देखने के लिए लड़के वाले घर आ रहे थे। सब तैयारियों में जुटे थे। मैंने मां से पूछा, क्या मेहमान आने वाले हैं? मां से पहले ही बड़ा भाई बोलने लगा- अगर तू उनके सामने आई तो मार-मार के हाथ-पैर तोड़ दूंगा। मनहूस, तेरी वजह से रिश्ता जुड़ने से पहले ही टूट जाएगा। मैं रोते हुए वहां से उठकर चला गया। जब मैं 10-11 साल का था तो मेरी उम्र की लड़कियां गुड्डे गुड़ियों से खेलती थीं, लेकिन मुझे तो लड़कों के साथ क्रिकेट खेलना अच्छा लगता था। छठवीं क्लास की बात है। एक दिन कुछ लड़के घर आए। कहने लगे क्रिकेट खेलने चलो। उस वक्त पापा घर पर ही थे। वो सुनते ही चीखने लगे-’लड़कों के साथ खेलने जाएगी, बाहर निकली तो टांगे तोड़ दूंगा। जैसे बाकी बहनें घर पर रहती हैं, वैसे ही तू भी रह।’ पापा को चीखते हुए सुनकर मैं कांपने लगा। फिर भी हिम्मत जुटाकर रोते हुए बड़ी बहन से बोला- पापा से कहो मुझे इनके साथ बाहर जाने दें। मैं भी इनमें से ही हूं।’