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सीकर, उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने कहा- आजकल बच्चों में विदेश जाकर पढ़ाई की नई बीमारी आई है। उसको सपना दिखता है कि वहां जाते ही तो स्वर्ग मिल जाएगा। कोई आकलन नहीं है कि किस संस्था में जा रहा है, किस देश में जा रहा है। बस एक अंधाधुंध रास्ता है कि मुझे विदेश जाना है। यहां तक की पेरेंट्स की काउंसिलिंग भी नहीं होती। धनखड़ शनिवार को शोभासरिया ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूट के सिल्वर जुबली एनुअल फंक्शन में बोल रहे थे।

उन्होंने कहा- शिक्षा का व्यापार बनना देश के भविष्य के लिए कभी अच्छा नहीं है। समाज को वापस देने और सेवा करने का काम आज एक व्यापार बन चुका है। मेरी मान्यता है कि शिक्षण संस्थाओं को आर्थिक रूप से संबल होना चाहिए।

धनखड़ ने कहा- एक जमाना था हमारे देश में नालंदा, तक्षशिला जैसे संस्थान थे, लेकिन बख्तियार खिलजी (तुर्क-अफगान) ने इन्हें बर्बाद कर दिया, हमारी संस्थाओं को नष्ट किया गया। अंग्रेज आए तो हमारी संस्थाओं की ताकत को कमजोर कर दिया।

इंडस्ट्री का भी दायित्व है कि समय-समय पर वह भी संस्थाओं को नर्चर करने के लिए CSR फंड का उपयोग करें। इनोवेशन और रिसर्च का सबसे बड़ा फायदा उद्योग को होता है। जो अर्थव्यवस्था को मजबूती देता है और देश को दुनिया के सामने ताकत देता है।

उपराष्ट्रपति बोले- इस साल 13.50 लाख स्टूडेंट्स विदेश गए धनखड़ ने कहा- आपको आश्चर्य होगा कि 18 से 25 साल के बीच के छात्र और छात्राएं विज्ञापन से प्रभावित हो जाते हैं। 2024 में 13.50 लाख स्टूडेंट्स विदेश गए। उनके भविष्य का क्या होगा, उसका आकलन हो रहा है। इसका देश पर कितना भार हो रहा है। 6 बिलियन यूएस डॉलर फॉरेन एक्सचेंज में जा रहा है। अंदाजा लगाइए कि यदि यह हमारे संस्थाओं के इंफ्रास्ट्रक्चर में लगाया जाता तो हमारे हालात क्या होते?

चारों तरफ होप और पॉसिबिलिटी का माहौल है। भारत संभावनाओं से भरा एक देश है और दुनिया भारत का लोहा मान चुकी है। इंटरनेशनल मोनेटरी फंड, वर्ल्ड बैंक जो कुछ समय पहले भारत को सिखाते थे कि शासन व्यवस्था कैसे हो, वह आजभारत की प्रशंसा करते हुए नहीं थकते हैं।

सांसद तिवाड़ी बोले- बंगाल का राज्यपाल बनाया तो झिझक रहे थे धनखड़ राज्यसभा सांसद घनश्याम तिवाड़ी ने कहा कि जगदीप धनखड़ आज यहां पर है, इसमें सबसे बड़ा हाथ उनकी पत्नी सुदेश धनखड़ का है। जब 5 दिन पहले मैं राष्ट्रपति एनक्लेव गया तो वहां पर उपराष्ट्रपति प्रतापगढ़ की वाल्मीकि समाज की बच्ची से पढ़ाई के बारे में पूछ रहे थे। जिसने कहा कि आर्थिक तंगी के चलते वह पढ़ नहीं पा रही है। इतने में वहां सुदेश धनखड़ आई और उस बच्ची की 2 साल की फीस खुद के अकाउंट से ट्रांसफर करने की बात कही।

जब जगदीप धनखड़ को बंगाल का राज्यपाल बनाया गया तो वह झिझक रहे थे। क्योंकि कोर्ट में तो उन्हें लाखों रुपए मिलते थे। राज्यपाल को केवल 3 से 4 लाख रुपए। इस पर सुदेश धनखड़ ने ही उन्हें देश की सेवा करने को कहा।

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