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राज्य सरकार ने आरजीएचएस के बढ़ते बजट और लगातार मिल रही ओवर-बिलिंग की शिकायतों पर नकेल कसने के लिए ने ओपीडी जांच के नियमों में बड़ा फेरबदल किया है। अब राज्य कर्मचारियों और पेंशनर्स को 2000 रुपए से अधिक की जांच के लिए पहले ऑनलाइन अनुमति लेनी होगी, उसके बाद जांच होगी।

वहीं दो हजार रु. तक की सामान्य जांचों के लिए पहले की तरह ही सीधी कैशलेस सुविधा मिलती रहेगी। इससे अधिक कीमत वाले टेस्ट्स के लिए अब अस्पतालों या डायग्नोस्टिक सेंटर्स को आरजीएचएस पोर्टल के जरिए पहले ऑनलाइन अनुमति लेनी होगी। इस अप्रूवल के बिना महंगे टेस्ट कैशलेस नहीं हो सकेंगे। नए बदलाव 13 जुलाई से लागू हो चुके हैं। आरजीएचएस की प्रोजेक्ट डायरेक्टर डॉ. निधि पटेल ने 8 जुलाई को ही निर्देश जारी किए थे। नए प्रावधानों के अनुसार थर्ड पार्टी एडमिनिस्ट्रेटर को आवेदन के अधिकतम 3 घंटे के भीतर मंजूरी देनी होगी। तय समय सीमा में टीपीए कोई फैसला नहीं ले पाता है, तो सिस्टम उसे ऑटो अप्रूव मान लेगा। राहत की बात यह है कि गंभीर व आपातकालीन स्थिति वाले मरीजों पर यह नियम बाधक नहीं बनेगा। ऐसे मरीजों का टेस्ट और इलाज तुरंत शुरू किया जा सकेगा और संबंधित दस्तावेज बाद में अपलोड किए जा सकेंगे।

स्वीकृति मिलने तक मरीजों को इंतजार करना पड़ेगा : नई व्यवस्था से सबसे अधिक असर बुजुर्ग पेंशनर्स व गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों पर पड़ सकता है। यदि किसी मरीज को सीबीसी, एलएफटी, केएफटी, लिपिड प्रोफाइल और अन्य सामान्य जांचें एक साथ लिखी जाती हैं, तो कई बार उनका कुल खर्च हजार रुपए से अधिक हो जाता है। ऐसे में स्वीकृति मिलने तक मरीजों को इंतजार करना पड़ सकता है। हालांकि सरकार का कहना है कि तीन घंटे की समय-सीमा और ऑटो-अप्रूवल व्यवस्था से अनावश्यक देरी नहीं होगी। सरकार को पिछले कुछ समय से शिकायतें मिल रही थीं कि कुछ अस्पताल और डायग्नोस्टिक सेंटर आवश्यकता नहीं होने पर भी आरजीएचएस लाभार्थियों की महंगी जांचें लिखकर योजना का खर्च बढ़ा रहे हैं। नई व्यवस्था के तहत ब्लड, यूरिन और अन्य सामान्य जांचें बिना किसी बाधा के होती रहेंगी। सीटी स्कैन, एमआरआई और अन्य महंगी जांचों के लिए पूर्व स्वीकृति अनिवार्य होगी। जांच के लिए जल्द ही ऑडिट भी शुरू होगी।

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